पूजा
पूजा से बुद्धि ,विद्या विवेक, रोग ,व्याधि एवं समस्त बाधाओं का नाश होता है भगवान की कृपया से असंभव काम भी आसान हो जाते हैं पूजा विशेष रूप से सभी बिघ्न बाधा नाश के लिए होती है किसी भी भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनका पुजा करनी चाहिए एवं घर में सुख शांति के लिए भी पूजा करनी चाहिए
P.Dhananjay Panday

मै ज्योतिष की फ्री सेवा करता हूँ जैसे कैरीअर,विवाह,व्यापर, नौकरी, संतान, मेलापक (गुण मिलान) इत्यादि, कौन सा रत्न आप के लिए अनुकूल रहेगा और आप के जीवन में कब आएगा गोल्डेन समय


8 साल से ज्योतिष कार्य का अनुभव          7 साल का का पूजा का अनुभव

हवन
प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वायुमण्डल रहते हैं । विभिन्न प्रकार के कीटणुओं की उत्पत्ति एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है । इसलिए कई बार वायुमण्डल अस्वास्थ्यकर हो जाता है । इस कारन अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन की जाती हैं,
विवाह
मानव जीवन में विवाह बहुत बड़ी विशेषता मानी गईहै। विवाह का वास्तविक अर्थ है- दो आत्माओं का आत्मिक मिलन। एक हृदय चाहता है कि वह दूसरे हृदय से सम्पर्क स्थापित करे, आपस में दोनों का आत्मिक प्रेम हो और हृदय मधुर कल्पना से ओतप्रोत हो।
कथा
सत्यनाराय भगवान की कथा लोक में प्रचलित है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। सत्यनारायण व्रतकथा स्कंदपुराण के रेवाखंडसे संकलित की गई है। सभी दु:खों से मुक्त, कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है।
मेलापक
गुण मिलान दो शरीरों का ही मिलन नहीं है अपितु दो आत्माओं का मिलन है। गृहस्थ जीवन को रथ के समान माना है। यदि दोनों पहिये एक धुरी पर समान गति से नहीं चले तो गृहस्थ जीवन में समृद्धि आना असंभव हो जाता है। जीवन नरक हो जाता है।
रुद्राभिषेक
शिव की उपासना से सभी प्रकार के दुख, भय, रोग, मृत्युभय आदि दूर होकर मनुष्य को दीर्घायु की प्राप्ति होती है। देश-दुनिया भर में होने वाले उपद्रवों की शांति तथा अभीष्ट फल प्राप्ति को लेकर रूद्राभिषेक आदि यज्ञ-अनुष्ठान किए जाते हैं। भगवान शिव की पूजा करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। ऐसा पुराणों में वर्णित है।
ज्योतिष
हम जैसा कर्म करते हैं उसी के अनुरूप हमें ईश्वर सुख दु:ख देता है। सुख दु:ख का निर्घारण ईश्वर कुण्डली में ग्रहों स्थिति के आधार पर करता है। जिस व्यक्ति का जन्म शुभ समय में होता है उसे जीवन में अच्छे फल मिलते हैं और जिनका अशुभ समय में उसे कटु फल मिलते हैं।
कालसर्प दोष
कालसर्प दोष है क्या, कालसर्प दो शब्दों से मिलकर बना है-काल और सर्प। जब सूर्यादि सातों ग्रह राहु(सर्प मुख) और केतु(सर्प की पूंछ) के मध्य आ जाते हैं तो कालसर्प योग बन जाता है। जिसकी कुण्डली में यह योग होता है उसके जीवन में काफी उतार चढ़ाव और संघर्ष आता है।
राशी रत्न
रत्न प्रकृति प्रदत्त एक मूल्यवान निधि है। मनुष्य अनादिकाल से ही रत्नों की तरफ आकर्षित रहा है, वर्तमान में भी है तथा भविष्य में भी रहेगा। रत्न आभूषणों के रूप में शरीर की शोभा तो बढ़ाते ही हैं, साथ ही अपनी दैवीय शक्ति के प्रभाव के कारण रोगों का निवारण भी करते हैं।

  • हमारे यहाँ पूजा, कथा, हवन, जप, यज्ञ, अनुष्ठान, गृहप्रवेश, नवग्रहशांति कालसर्पदोष शांति एवं सभी प्रकार के पूजा-पाठ संपन्न कराये जाते है
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